ASD वाले व्यक्तियों का आकलन
Course Code: Course III – Assessment of Children with Developmental Disabilities
Reference: Rehabilitation Council of India Syllabus
ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) एक जटिल विकासात्मक दिव्यांगता है। चूंकि यह एक “स्पेक्ट्रम” है (यानी लक्षण हर बच्चे में अलग-अलग हो सकते हैं), इसलिए इसका आकलन बहुत सावधानी से किया जाना चाहिए। इस इकाई में हम ASD की स्क्रीनिंग, निदान, और विभिन्न आकलन उपकरणों (Tools) के बारे में विस्तार से जानेंगे।
स्क्रीनिंग और निदान: मानदंड और उपकरण (Screening and Diagnosis: Criteria and Tools)
ASD का पता लगाने के लिए दो मुख्य चरण होते हैं: स्क्रीनिंग (जोखिम की पहचान) और निदान (पुष्टि)।
A. नैदानिक मानदंड (Diagnostic Criteria)
निदान करने के लिए डॉक्टर या मनोवैज्ञानिक कुछ अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन करते हैं:
1. DSM-5 (Diagnostic and Statistical Manual of Mental Disorders – 5th Edition)
यह अमेरिकन साइकियाट्रिक एसोसिएशन द्वारा जारी किया गया है। DSM-5 के अनुसार, ASD के निदान के लिए दो मुख्य क्षेत्रों में कमी होनी चाहिए:
- सामाजिक संचार और अंतःक्रिया (Social Communication & Interaction): आँख न मिलाना, बातचीत शुरू न कर पाना, भावनाओं को न समझना।
- सीमित और दोहराव वाले व्यवहार (Restricted & Repetitive Behaviors – RRBs): एक ही काम बार-बार करना (हाथ हिलाना), दिनचर्या में बदलाव पसंद न करना, विशिष्ट चीजों में अत्यधिक रुचि।
2. ICD-10 (International Classification of Diseases)
यह विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा जारी किया गया है। भारत के अस्पतालों में अक्सर इसका उपयोग किया जाता है। इसमें ऑटिज्म को ‘Pervasive Developmental Disorders’ (PDD) के तहत रखा गया था। (नोट: अब ICD-11 आ चुका है जो DSM-5 के समान है)।
3. ICF (International Classification of Functioning)
यह बच्चे की “बीमारी” पर नहीं, बल्कि उसकी कार्यक्षमता (Functioning) और सहभागिता (Participation) पर ध्यान केंद्रित करता है। यह देखता है कि बच्चा अपने वातावरण में कैसे काम कर रहा है और उसे किन बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है।
B. प्रमुख उपकरण (Assessment Tools)
परीक्षा के लिए ये टूल्स सबसे महत्वपूर्ण हैं:
| उपकरण (Tool) | पूरा नाम (Full Name) | उपयोग और विवरण |
|---|---|---|
| M-CHAT R/F | Modified Checklist for Autism in Toddlers | स्क्रीनिंग टूल: यह 16 से 30 महीने के छोटे बच्चों के लिए है। इसमें 20 ‘हां/नहीं’ वाले प्रश्न होते हैं जो माता-पिता से पूछे जाते हैं। यह जल्दी पता लगाने (Early Intervention) के लिए बेस्ट है। [cite: 455] |
| ISAA | Indian Scale for Assessment of Autism | भारतीय टूल: इसे NIMH (अब NIEPID) द्वारा विकसित किया गया है। इसमें 40 आइटम हैं और 6 डोमेन हैं। यह भारत में प्रमाणन (Certification) के लिए उपयोग किया जाता है। इससे ऑटिज्म की गंभीरता (Mild, Moderate, Severe) का स्कोर निकलता है। [cite: 455] |
| CARS-2 | Childhood Autism Rating Scale (2nd Ed) | रेटिंग स्केल: यह प्रत्यक्ष अवलोकन (Observation) पर आधारित है। पेशेवर बच्चे के व्यवहार को देखते हैं और 1 से 4 के पैमाने पर रेट करते हैं। यह दुनिया भर में सबसे विश्वसनीय टूल्स में से एक है। [cite: 455] |
| INCLEN / INDT-ASD | AIIMS-Modified INCLEN Diagnostic Tool | निदान टूल: इसे AIIMS नई दिल्ली और INCLEN ट्रस्ट ने बनाया है। यह भारतीय संदर्भ में निदान के लिए बहुत सटीक है और DSM-IV मानदंडों पर आधारित है। [cite: 455] |
सीखने की शैलियों और रणनीतियों का आकलन (Assessments of Learning Styles and Strategies)
ASD वाले बच्चे ‘अलग’ तरह से सीखते हैं। एक विशेष शिक्षक को यह जानना होता है कि बच्चा कैसे सीखता है ताकि IEP बनाया जा सके।
1. व्यवहारात्मक आकलन (Behavioural Assessment)
ऑटिज्म में समस्या व्यवहार (Problem Behaviour) आम है। हम FBA (Functional Behavioural Analysis) का उपयोग करते हैं:
- A (Antecedent): व्यवहार से पहले क्या हुआ? (ट्रिगर)।
- B (Behaviour): व्यवहार क्या था? (चिल्लाना, मारना)।
- C (Consequence): व्यवहार के बाद क्या हुआ? (क्या उसे ध्यान मिला? क्या उसे खिलौना मिला?)।
2. कार्यात्मक आकलन (Functional Assessment)
यह देखना कि क्या बच्चा अपने ज्ञान का उपयोग वास्तविक जीवन में कर सकता है। जैसे- वह रंगों के नाम जानता है, लेकिन क्या वह ट्रैफिक लाइट देखकर रुकता है?
3. अनुकूली आकलन (Adaptive Assessment)
दैनिक जीवन के कौशल (ADL) का आकलन। इसके लिए VSMS (Vineland Social Maturity Scale) का उपयोग किया जाता है। यह बताता है कि बच्चे की ‘सामाजिक आयु’ (Social Age) क्या है।
4. शैक्षिक और व्यावसायिक आकलन
- शैक्षिक: क्या बच्चा विजुअल लर्नर (देखकर सीखने वाला) है? ज्यादातर ASD बच्चे Visual Learners होते हैं।
- व्यावसायिक (Vocational): बड़े बच्चों के लिए यह देखना कि वे किस काम में अच्छे हैं (जैसे कंप्यूटर, फाइलिंग, पेंटिंग) ताकि उन्हें रोजगार के लिए तैयार किया जा सके।
विभेदक निदान (Differential Diagnosis)
कई बार अन्य दिव्यांगताओं के लक्षण ऑटिज्म जैसे लगते हैं। ‘विभेदक निदान’ का अर्थ है यह सुनिश्चित करना कि यह ऑटिज्म ही है या कुछ और।
- ASD बनाम ID (बौद्धिक अक्षमता): ID वाले बच्चे का विकास सभी क्षेत्रों में धीमा होता है, जबकि ASD वाले बच्चे का मोटर विकास अच्छा हो सकता है लेकिन सामाजिक कौशल बहुत कमजोर होता है।
- ASD बनाम श्रवण दोष (Hearing Impairment): बहरा बच्चा आवाज पर प्रतिक्रिया नहीं देता क्योंकि वह सुन नहीं सकता। ASD वाला बच्चा सुन सकता है लेकिन उसे प्रतिक्रिया देने में रुचि नहीं होती (Selective attention)।
- ASD बनाम ADHD: ADHD वाले बच्चे चंचल होते हैं और ध्यान नहीं दे पाते, लेकिन वे दूसरों से बात करना और खेलना पसंद करते हैं। ASD वाले बच्चे अपनी ही दुनिया में खोए रहते हैं।
संबद्ध स्थितियों का आकलन (Assessment of Associated Conditions)
ASD अक्सर अकेला नहीं आता। इसके साथ अन्य समस्याएं (Co-morbidities) भी जुड़ी हो सकती हैं। इनका आकलन करना जरूरी है:
- मिर्गी (Epilepsy/Seizures): लगभग 30% ASD बच्चों को दौरे पड़ते हैं। इसके लिए EEG टेस्ट की जरूरत होती है।
- संवेदी प्रसंस्करण विकार (Sensory Processing Disorder): कुछ बच्चे तेज आवाज से डरते हैं या किसी खास कपड़े को नहीं पहनते। इसके लिए ‘Sensory Profile’ चेकलिस्ट का उपयोग होता है।
- नींद और पेट की समस्याएं: नींद न आना और पाचन संबंधी समस्याएं आम हैं।
- चिंता और डिप्रेशन (Anxiety): विशेष रूप से उच्च कार्यशील (High functioning) ऑटिज्म वाले बच्चों में।
आकलन का दस्तावेजीकरण, व्याख्या और रिपोर्ट लेखन (Documentation and Report Writing)
आकलन के बाद एक विस्तृत रिपोर्ट बनाना विशेष शिक्षक का मुख्य कर्तव्य है। [cite: 460, 476]
रिपोर्ट का ढांचा (Structure of Report):
- जैव-डेटा (Bio-data): नाम, उम्र, लिंग, दिनांक।
- रेफरल का कारण: बच्चे को आकलन के लिए क्यों लाया गया?
- पृष्ठभूमि का इतिहास: जन्म का इतिहास, विकास का इतिहास, परिवार का विवरण।
- उपयोग किए गए उपकरण: (जैसे ISAA, Observation, Checklist)।
- अवलोकन (Observations): टेस्ट के दौरान बच्चे का व्यवहार (सहयोग किया या नहीं, आँख मिलाई या नहीं)।
- परिणाम और व्याख्या (Results & Interpretation):
- केवल स्कोर न लिखें (जैसे “स्कोर 80”), बल्कि उसका मतलब समझाएं (जैसे “स्कोर 80 का अर्थ है मध्यम स्तर का ऑटिज्म”)।
- बच्चे की ताकतों (Strengths) और जरूरतों (Needs) को स्पष्ट लिखें।
- सिफारिशें (Recommendations):
- IEP के लिए लक्ष्य।
- माता-पिता के लिए घर पर करने योग्य गतिविधियां।
- थेरेपी की आवश्यकता (OT/ST)।
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