B.Ed. Special Education गणित शिक्षण Unit 5 – आकलन एवं मूल्यांकन, निदानात्मक परीक्षण और समावेशी मूल्यांकन।

Assessment and Evaluation for Mathematics Learning

गणित अधिगम के लिए आकलन एवं मूल्यांकन

परिचय (Introduction)

गणित शिक्षण में आकलन एवं मूल्यांकन का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इनके माध्यम से शिक्षक यह जान सकता है कि विद्यार्थी गणितीय अवधारणाओं को किस सीमा तक समझ पाए हैं, किन कौशलों में उन्हें कठिनाई हो रही है और उनके अधिगम में सुधार के लिए किस प्रकार की सहायता आवश्यक है।

गणित में आकलन केवल परीक्षा में प्राप्त अंकों तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसमें विद्यार्थियों की अवधारणात्मक समझ, गणना कौशल, समस्या समाधान, तार्किक चिंतन, गणितीय संप्रेषण तथा दैनिक जीवन में गणित के उपयोग का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।

विशेष शिक्षा के संदर्भ में आकलन प्रक्रिया को विद्यार्थियों की व्यक्तिगत आवश्यकताओं, क्षमताओं और उत्तर देने के उपयुक्त तरीकों के अनुसार लचीला बनाना आवश्यक है। उपयुक्त अनुकूलन के माध्यम से विद्यार्थी अपनी वास्तविक गणितीय उपलब्धियों को बेहतर ढंग से प्रदर्शित कर सकते हैं।


5.1 Assessment and Evaluation: Concept, Importance, Purpose and Flexibility

आकलन एवं मूल्यांकन: अवधारणा, महत्त्व, उद्देश्य और लचीलापन

5.1.1 आकलन का अर्थ (Meaning of Assessment)

आकलन एक सतत प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से विद्यार्थी के ज्ञान, कौशल, समझ, प्रगति और अधिगम संबंधी आवश्यकताओं के बारे में जानकारी एकत्र की जाती है।

गणित में आकलन के अंतर्गत मौखिक प्रश्न, लिखित कार्य, कक्षा गतिविधियाँ, कार्यपत्रक, अवलोकन, गणितीय समस्याओं का समाधान और परियोजनाएँ शामिल हो सकती हैं।

उदाहरण: शिक्षक विद्यार्थियों को तीन जोड़ संबंधी प्रश्न देता है और उनके उत्तरों के साथ-साथ हल करने की प्रक्रिया का भी अवलोकन करता है। इससे शिक्षक को यह समझने में सहायता मिलती है कि विद्यार्थी को गणना में कठिनाई है या स्थानमान की अवधारणा में।

5.1.2 मूल्यांकन का अर्थ (Meaning of Evaluation)

मूल्यांकन वह प्रक्रिया है जिसमें आकलन से प्राप्त जानकारी के आधार पर विद्यार्थी की उपलब्धियों, शिक्षण की प्रभावशीलता या निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति के संबंध में निर्णय लिया जाता है।

उदाहरण: किसी इकाई की परीक्षा और कक्षा गतिविधियों के परिणामों के आधार पर शिक्षक यह निर्णय लेता है कि विद्यार्थियों ने निर्धारित गणितीय कौशल में अपेक्षित प्रगति की है या नहीं।

5.1.3 आकलन और मूल्यांकन में अंतर

आकलन (Assessment)मूल्यांकन (Evaluation)
अधिगम संबंधी जानकारी एकत्र करता है।उपलब्धियों और परिणामों के आधार पर निर्णय लेने में सहायता करता है।
प्रायः सतत प्रक्रिया होती है।निर्धारित समय पर या सतत जानकारी के आधार पर किया जा सकता है।
कठिनाइयों और प्रगति की पहचान करता है।उद्देश्यों की प्राप्ति और शिक्षण की प्रभावशीलता का निर्णय करने में सहायता करता है।
सुधार के लिए प्रतिक्रिया प्रदान करता है।ग्रेड, उपलब्धि या आगे की शैक्षिक योजना से संबंधित निर्णयों में उपयोग हो सकता है।

5.1.4 गणित में आकलन एवं मूल्यांकन का महत्त्व (Importance)

1. अधिगम की प्रगति जानना: विद्यार्थी गणितीय अवधारणाओं और कौशलों में कितना आगे बढ़े हैं, इसका पता चलता है।

2. कठिनाइयों की पहचान: शिक्षक यह जान सकता है कि विद्यार्थी को संख्या पहचान, गणना, भिन्न, मापन या समस्या समाधान में कहाँ कठिनाई हो रही है।

3. शिक्षण में सुधार: प्राप्त जानकारी के आधार पर शिक्षक अपनी शिक्षण विधियों और गतिविधियों में आवश्यक बदलाव कर सकता है।

4. पुनर्बलन और सुधारात्मक शिक्षण: जिन विद्यार्थियों को अतिरिक्त अभ्यास की आवश्यकता है, उन्हें उपयुक्त सहायता दी जा सकती है।

5. प्रेरणा और आत्मविश्वास: स्पष्ट और रचनात्मक प्रतिक्रिया विद्यार्थियों को अपनी प्रगति समझने और आगे सीखने के लिए प्रेरित कर सकती है।

6. व्यक्तिगत आवश्यकताओं की पहचान: विशेष शिक्षा में आकलन विद्यार्थियों की शक्तियों, आवश्यकताओं और उपयुक्त शिक्षण सहायता को समझने में उपयोगी है।

7. शैक्षिक उद्देश्यों की समीक्षा: शिक्षक यह जाँच सकता है कि निर्धारित उद्देश्य प्राप्त हुए हैं या उनमें संशोधन की आवश्यकता है।

5.1.5 आकलन एवं मूल्यांकन के उद्देश्य (Purpose)

गणित में आकलन एवं मूल्यांकन के प्रमुख उद्देश्य निम्न हैं:

  • पूर्वज्ञान और वर्तमान अधिगम स्तर की पहचान करना।
  • गणितीय ज्ञान एवं कौशल का आकलन करना।
  • विद्यार्थियों की प्रगति का अभिलेखन करना।
  • त्रुटियों और अधिगम संबंधी कठिनाइयों का पता लगाना।
  • शिक्षण विधियों की प्रभावशीलता की समीक्षा करना।
  • सुधारात्मक शिक्षण और अतिरिक्त सहायता की योजना बनाना।
  • विद्यार्थियों को उपयोगी प्रतिक्रिया प्रदान करना।
  • शैक्षिक उपलब्धियों और अधिगम संबंधी आवश्यकताओं की जानकारी अभिभावकों तथा संबंधित शिक्षकों के साथ साझा करना।

5.1.6 आकलन में लचीलापन (Flexibility in Assessment)

आकलन में लचीलेपन का अर्थ है कि विद्यार्थियों की व्यक्तिगत आवश्यकताओं और निर्धारित अधिगम उद्देश्यों के अनुसार आकलन के तरीके, समय, प्रस्तुतीकरण या उत्तर देने के माध्यम में उपयुक्त परिवर्तन किए जाएँ।

इसका उद्देश्य आकलन की अनावश्यक बाधाओं को कम करना है, न कि बिना उचित आधार के अधिगम उद्देश्यों को बदल देना।

लचीले आकलन के उदाहरण:

  1. आवश्यकता के अनुसार अतिरिक्त समय देना।
  2. बड़े अक्षरों या स्पष्ट मुद्रण वाले प्रश्नपत्र उपलब्ध कराना।
  3. उपयुक्त डिजिटल या सहायक उपकरणों का उपयोग करने देना।
  4. आवश्यकतानुसार मौखिक उत्तर या अन्य वैकल्पिक उत्तर माध्यम उपलब्ध कराना।
  5. निर्देशों को सरल और स्पष्ट भाषा में प्रस्तुत करना।
  6. लंबे कार्य को छोटे चरणों में बाँटना।
  7. सुलभ स्थान और उपयुक्त बैठने की व्यवस्था करना।
  8. गणितीय सामग्री के उपयोग की अनुमति देना, यदि वह जाँचे जा रहे कौशल का हिस्सा न हो।
  9. उपयुक्त विश्राम या विराम की व्यवस्था करना, जहाँ आवश्यक हो।

उदाहरण: यदि उद्देश्य ज्यामितीय आकृतियों के गुणों की समझ जाँचना है, तो दृष्टिबाधित विद्यार्थी को स्पर्शनीय आकृतियाँ उपलब्ध कराई जा सकती हैं। इससे विद्यार्थी की समझ का आकलन किया जा सकता है, भले ही वह सामान्य चित्रों को देखकर पहचान न कर सके।

आकलन में अनुकूलन संबंधित नियमों, निर्धारित उद्देश्यों और विद्यार्थी की आवश्यकताओं के अनुरूप होना चाहिए।


5.2 Error Analysis, Diagnostic Tests, Identification of Hard Spots and Remedial Measures

त्रुटि विश्लेषण, निदानात्मक परीक्षण, कठिन अधिगम बिंदुओं की पहचान एवं उपचारात्मक उपाय

5.2.1 त्रुटि विश्लेषण का अर्थ (Meaning of Error Analysis)

त्रुटि विश्लेषण वह प्रक्रिया है जिसमें विद्यार्थी द्वारा किए गए गलत उत्तरों, गणना संबंधी गलतियों या समाधान की प्रक्रिया का अध्ययन किया जाता है, ताकि कठिनाई के संभावित कारणों को समझा जा सके।

गणित में गलत उत्तर हमेशा ज्ञान की कमी का संकेत नहीं होता। कभी-कभी विद्यार्थी अवधारणा को गलत समझता है, कभी प्रक्रिया में गलती करता है और कभी निर्देशों को ठीक से समझ नहीं पाता।

गणित में त्रुटियों के प्रमुख प्रकार

1. अवधारणात्मक त्रुटि (Conceptual Error): विद्यार्थी गणितीय अवधारणा को सही ढंग से नहीं समझता।

उदाहरण: विद्यार्थी यह समझता है कि हर बड़ी संख्या हमेशा छोटी संख्या से विभाज्य होगी।

2. प्रक्रियात्मक त्रुटि (Procedural Error): विद्यार्थी सही अवधारणा जानता है, लेकिन गणना के चरणों में गलती करता है।

उदाहरण: लंबवत जोड़ में इकाई और दहाई के स्थानों को सही ढंग से व्यवस्थित नहीं करना।

3. गणना संबंधी त्रुटि (Computational Error): विद्यार्थी गणना करते समय जोड़, घटाव, गुणा या भाग में गलती करता है।

4. स्थानमान संबंधी त्रुटि (Place-Value Error): विद्यार्थी इकाई, दहाई और सैकड़े के स्थानों को सही ढंग से नहीं समझता।

5. भाषा संबंधी त्रुटि (Language-Related Error): विद्यार्थी प्रश्न में प्रयुक्त शब्दों या निर्देशों का अर्थ समझने में कठिनाई अनुभव करता है।

6. ध्यान या कार्य-संगठन संबंधी त्रुटि: विद्यार्थी किसी चरण को छोड़ देता है, संकेत गलत पढ़ता है या उत्तर लिखते समय गलती करता है।

त्रुटि विश्लेषण के चरण

  1. विद्यार्थी के उत्तर और समाधान की प्रक्रिया एकत्र करना।
  2. गलतियों के प्रकार की पहचान करना।
  3. विद्यार्थी से अपनी प्रक्रिया समझाने के लिए कहना, जहाँ उपयुक्त हो।
  4. संभावित कारणों की जाँच करना।
  5. कठिनाई के अनुरूप सुधारात्मक गतिविधि तैयार करना।
  6. दोबारा आकलन करके प्रगति की जाँच करना।

उदाहरण: विद्यार्थी 42 − 18 को गलत हल करता है। शिक्षक केवल गलत उत्तर बताने के बजाय यह जाँचता है कि विद्यार्थी पुनर्गठन की प्रक्रिया समझता है या नहीं। यदि कठिनाई दहाई और इकाई के संबंध में है, तो स्थानमान ब्लॉक और संख्या रेखा की सहायता से पुनः शिक्षण किया जा सकता है।

5.2.2 निदानात्मक परीक्षण (Diagnostic Tests)

निदानात्मक परीक्षण एक ऐसा परीक्षण है जिसका उद्देश्य किसी विशिष्ट विषय या कौशल में विद्यार्थी की कठिनाइयों और उनके संभावित कारणों की पहचान करना है।

यह सामान्य उपलब्धि परीक्षण से अलग है, क्योंकि इसका प्रमुख उद्देश्य केवल अंक देना नहीं, बल्कि अधिगम में सुधार के लिए आवश्यक जानकारी प्राप्त करना है।

निदानात्मक परीक्षण के उद्देश्य:

  • वर्तमान ज्ञान और कौशल की पहचान।
  • विशिष्ट त्रुटियों का पता लगाना।
  • पूर्वापेक्षित ज्ञान की जाँच।
  • कठिन अधिगम बिंदुओं का निर्धारण।
  • व्यक्तिगत या समूह आधारित सुधारात्मक शिक्षण की योजना बनाना।

उदाहरण: यदि कोई विद्यार्थी भिन्नों का जोड़ नहीं कर पाता, तो शिक्षक पहले यह जाँच सकता है कि विद्यार्थी समान और असमान भिन्नों में अंतर समझता है या नहीं, अंश और हर की पहचान कर सकता है या नहीं तथा समतुल्य भिन्नों की अवधारणा समझता है या नहीं।

निदानात्मक परीक्षण तैयार करने के चरण

  1. संबंधित गणितीय कौशल का चयन।
  2. आवश्यक पूर्वापेक्षित ज्ञान की पहचान।
  3. छोटे और विशिष्ट प्रश्न तैयार करना।
  4. विभिन्न प्रकार की त्रुटियों को पहचानने योग्य प्रश्न शामिल करना।
  5. उपयुक्त निर्देश और सुलभ प्रारूप देना।
  6. उत्तरों का विश्लेषण करना।
  7. आवश्यक सुधारात्मक उपाय निर्धारित करना।
  8. पुनः परीक्षण या वैकल्पिक गतिविधि से प्रगति जाँचना।

5.2.3 कठिन अधिगम बिंदुओं की पहचान (Identification of Hard Spots)

कठिन अधिगम बिंदु वे अवधारणाएँ, प्रक्रियाएँ या कौशल हैं जिन्हें विद्यार्थी समझने या लागू करने में बार-बार कठिनाई अनुभव करते हैं।

गणित में निम्न विषय कई विद्यार्थियों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं:

  • स्थानमान और पुनर्गठन।
  • भिन्नों की तुलना और संक्रियाएँ।
  • ऋणात्मक संख्याएँ।
  • बीजगणितीय प्रतीक और समीकरण।
  • ज्यामितीय प्रमेय।
  • क्षेत्रफल और आयतन।
  • शब्द समस्याएँ।
  • ग्राफ और आँकड़ों की व्याख्या।
  • गणितीय सूत्रों का अनुप्रयोग।

किसी विषय को सभी विद्यार्थियों के लिए कठिन मानना उचित नहीं है। कठिन अधिगम बिंदुओं की पहचान वास्तविक विद्यार्थी प्रदर्शन, अवलोकन और आकलन के आधार पर करनी चाहिए।

कठिन बिंदुओं की पहचान के तरीके

  • कक्षा में विद्यार्थियों के कार्य का अवलोकन।
  • लिखित उत्तरों और कार्यपत्रकों का विश्लेषण।
  • मौखिक प्रश्न और चर्चा।
  • निदानात्मक परीक्षण।
  • पूर्वापेक्षित कौशल की जाँच।
  • विद्यार्थी की प्रतिक्रिया और आत्ममूल्यांकन।
  • आवश्यकता के अनुसार अभिभावकों या अन्य संबंधित शिक्षकों से जानकारी लेना।

5.2.4 उपचारात्मक उपाय (Remedial Measures)

उपचारात्मक शिक्षण वह नियोजित शिक्षण प्रक्रिया है जिसमें पहचानी गई कठिनाइयों को दूर करने के लिए लक्षित सहायता, अतिरिक्त अभ्यास और वैकल्पिक शिक्षण विधियाँ अपनाई जाती हैं।

प्रमुख उपचारात्मक उपाय:

1. पूर्वापेक्षित कौशल का पुनः शिक्षण: यदि विद्यार्थी को मूल अवधारणा समझने में कठिनाई है, तो पहले उसी अवधारणा पर कार्य किया जाता है।

2. ठोस सामग्री का उपयोग: काउंटर, ब्लॉक, अबेकस और भिन्न पट्टियों की सहायता से अवधारणाओं को स्पष्ट किया जा सकता है।

3. छोटे शिक्षण चरण: जटिल कार्य को छोटे और व्यवस्थित चरणों में बाँटना।

4. स्पष्ट प्रदर्शन: शिक्षक पहले प्रक्रिया का उदाहरण देता है, फिर विद्यार्थी के साथ अभ्यास करता है और अंत में स्वतंत्र अभ्यास करवाता है।

5. अतिरिक्त अभ्यास: विद्यार्थी की आवश्यकता के अनुसार समान प्रकार के प्रश्न और विविध उदाहरण देना।

6. त्वरित प्रतिक्रिया: गलतियों को स्पष्ट करके सही प्रक्रिया का अभ्यास कराना।

7. वैकल्पिक प्रस्तुतीकरण: चित्र, संख्या रेखा, मौखिक व्याख्या, स्पर्शनीय सामग्री या डिजिटल संसाधन का उपयोग।

8. प्रगति की निगरानी: नियमित छोटे आकलनों से यह देखना कि उपचारात्मक शिक्षण से सुधार हुआ या नहीं।

उदाहरण: यदि विद्यार्थी भिन्नों की तुलना नहीं कर पाता, तो शिक्षक समान आकार के भिन्न चक्र दिखाता है, फिर चित्रों के माध्यम से तुलना कराता है और अंत में संख्यात्मक प्रश्न देता है।

उपचारात्मक शिक्षण का उद्देश्य विद्यार्थी को दोष देना नहीं, बल्कि कठिनाई का कारण समझकर प्रभावी सहायता प्रदान करना है।


5.3 Tools and Techniques for Formative and Summative Assessment

गणित में रचनात्मक एवं संकलनात्मक आकलन के उपकरण और तकनीकें

5.3.1 रचनात्मक आकलन (Formative Assessment)

रचनात्मक आकलन शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया के दौरान किया जाता है। इसका उद्देश्य विद्यार्थी की प्रगति समझना और समय रहते शिक्षण में सुधार करना है।

उदाहरण:

  • कक्षा में मौखिक प्रश्न।
  • लघु प्रश्नोत्तरी।
  • कार्यपत्रक।
  • गृहकार्य की समीक्षा।
  • अवलोकन।
  • गणितीय गतिविधियों का प्रदर्शन।
  • सहपाठी प्रतिक्रिया।
  • स्व-मूल्यांकन।

लाभ:

  • कठिनाइयों की शीघ्र पहचान।
  • समय पर प्रतिक्रिया।
  • शिक्षण विधियों में सुधार।
  • विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी।
  • सुधारात्मक शिक्षण की योजना।

5.3.2 संकलनात्मक आकलन (Summative Assessment)

संकलनात्मक आकलन किसी निर्धारित इकाई, पाठ्यक्रम या शिक्षण अवधि के अंत में विद्यार्थी की उपलब्धियों का आकलन करने के लिए किया जाता है।

उदाहरण:

  • इकाई परीक्षा।
  • सत्रांत परीक्षा।
  • निर्धारित पाठ्यक्रम पर आधारित उपलब्धि परीक्षण।
  • परियोजना या कार्य का अंतिम मूल्यांकन।
  • निर्धारित मानदंडों पर आधारित प्रदर्शन का आकलन।

लाभ:

  • समग्र उपलब्धि की जानकारी।
  • निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति का आकलन।
  • रिपोर्ट कार्ड या शैक्षिक अभिलेख के लिए जानकारी।
  • आगे की शिक्षण योजना बनाने में सहायता।

रचनात्मक और संकलनात्मक आकलन में अंतर

रचनात्मक आकलनसंकलनात्मक आकलन
शिक्षण के दौरान किया जाता है।सामान्यतः इकाई या अवधि के अंत में किया जाता है।
सुधार और प्रतिक्रिया पर केंद्रित होता है।उपलब्धि का समग्र आकलन करता है।
नियमित और छोटे कार्यों का उपयोग हो सकता है।परीक्षा, परियोजना या समेकित कार्य का उपयोग हो सकता है।
शिक्षण को समायोजित करने में मदद करता है।रिपोर्टिंग और उपलब्धि संबंधी निर्णयों में मदद करता है।

दोनों प्रकार के आकलन एक-दूसरे के पूरक हैं।

5.3.3 गणित में आकलन के प्रमुख उपकरण (Tools of Assessment)

1. लिखित परीक्षण: गणितीय प्रश्नों, गणनाओं, व्याख्याओं और समस्या समाधान का आकलन।

2. मौखिक प्रश्न: विद्यार्थी की अवधारणात्मक समझ और गणितीय तर्क की जाँच।

3. अवलोकन सूची (Observation Checklist): गतिविधि के दौरान विद्यार्थी द्वारा प्रदर्शित कौशलों का अभिलेखन।

4. रेटिंग स्केल (Rating Scale): किसी निर्धारित कौशल या व्यवहार की प्रगति को पूर्वनिर्धारित स्तरों पर दर्ज करना।

5. रूब्रिक (Rubric): स्पष्ट मानदंडों के आधार पर किसी कार्य या प्रदर्शन की गुणवत्ता का आकलन।

6. पोर्टफोलियो (Portfolio): विद्यार्थी के कार्यों, परियोजनाओं, परीक्षणों और प्रगति के नमूनों का व्यवस्थित संग्रह।

7. कार्यपत्रक (Worksheet): किसी विशेष अवधारणा या कौशल के अभ्यास और आकलन के लिए प्रश्नों का संग्रह।

8. परियोजना कार्य (Project Work): वास्तविक जीवन की समस्या पर गणितीय ज्ञान के उपयोग का आकलन।

9. स्व-मूल्यांकन (Self-Assessment): विद्यार्थी स्वयं अपनी समझ, कठिनाइयों और प्रगति पर विचार करता है।

10. सहपाठी आकलन (Peer Assessment): विद्यार्थी निर्धारित मानदंडों के आधार पर सहपाठियों के कार्य पर प्रतिक्रिया देते हैं।

5.3.4 विद्यालय आधारित आकलन (School-Based Assessment)

विद्यालय आधारित आकलन वह प्रक्रिया है जिसमें शिक्षक और विद्यालय नियमित शिक्षण गतिविधियों के दौरान विद्यार्थियों की प्रगति और उपलब्धियों का आकलन करते हैं।

इसमें कक्षा कार्य, मौखिक प्रश्न, लिखित कार्य, परियोजनाएँ, गतिविधियाँ, परीक्षण और शिक्षक का व्यवस्थित अवलोकन शामिल हो सकता है।

गणित में उदाहरण:

  • विद्यार्थी द्वारा गणितीय उपकरणों का उपयोग।
  • दैनिक अभ्यास में प्रगति।
  • समस्या समाधान की प्रक्रिया।
  • समूह गतिविधियों में योगदान।
  • गणितीय अवधारणाओं का व्यावहारिक उपयोग।

विद्यालय आधारित आकलन में मानदंड स्पष्ट होने चाहिए और निर्णय केवल व्यक्तिगत धारणा पर आधारित नहीं होने चाहिए।

5.3.5 समग्र विकास का आकलन (Assessment of Holistic Development)

समग्र विकास का आकलन विद्यार्थी की प्रगति को व्यापक रूप से समझने का प्रयास करता है। गणित में केवल सही उत्तर देखना पर्याप्त नहीं है; आवश्यकता के अनुसार समस्या समाधान, गणितीय तर्क, प्रयास, सहयोग और स्वतंत्र रूप से कार्य करने की प्रगति पर भी ध्यान दिया जा सकता है।

प्रमुख क्षेत्र:

  • गणितीय ज्ञान और समझ।
  • गणना तथा समस्या समाधान कौशल।
  • तार्किक चिंतन।
  • गणितीय संप्रेषण।
  • गतिविधियों में सहभागिता।
  • सहयोग और कार्य पूरा करने की क्षमता।
  • स्वतंत्र रूप से कार्य करने में प्रगति।
  • सीखे गए कौशल का व्यावहारिक उपयोग।

इन क्षेत्रों का आकलन पाठ्यक्रम, निर्धारित उद्देश्यों और विद्यार्थी की आवश्यकताओं के अनुसार किया जाना चाहिए। सामाजिक या व्यवहार संबंधी टिप्पणियों को गणितीय उपलब्धि से अलग और स्पष्ट रूप में दर्ज करना उपयोगी है।


5.4 Preparation of Diagnostic Test, Achievement Test and Holistic Development Report Card

निदानात्मक परीक्षण, उपलब्धि परीक्षण एवं समग्र विकास रिपोर्ट कार्ड का निर्माण

5.4.1 निदानात्मक परीक्षण की तैयारी (Preparation of Diagnostic Test)

निदानात्मक परीक्षण का उद्देश्य किसी विशिष्ट गणितीय कठिनाई की पहचान करना है। इसके प्रश्न सीमित और स्पष्ट कौशलों पर केंद्रित होने चाहिए।

तैयारी के चरण:

  1. विषय या कौशल का चयन।
  2. अपेक्षित अधिगम उद्देश्य निर्धारित करना।
  3. पूर्वापेक्षित ज्ञान की पहचान।
  4. कठिनाई के संभावित क्षेत्रों का निर्धारण।
  5. छोटे और विशिष्ट प्रश्न तैयार करना।
  6. उत्तरों की जाँच के लिए स्पष्ट मानदंड बनाना।
  7. परीक्षण को आवश्यकतानुसार सुलभ बनाना।
  8. परिणामों का विश्लेषण करके सुधारात्मक शिक्षण निर्धारित करना।

नमूना निदानात्मक परीक्षण

विषय: प्राथमिक स्तर पर जोड़ और घटाव

उद्देश्य: विद्यार्थी की संख्या पहचान, स्थानमान, जोड़ और घटाव की समझ की जाँच करना।

प्रश्नजाँचा जाने वाला कौशल
1. संख्या 34 में कितनी दहाइयाँ और कितनी इकाइयाँ हैं?स्थानमान
2. 12 + 5 = ?सरल जोड़
3. 26 + 17 = ?पुनर्गठन सहित जोड़
4. 18 − 6 = ?सरल घटाव
5. 42 − 18 = ?पुनर्गठन सहित घटाव

परिणामों का उपयोग: यदि विद्यार्थी स्थानमान के प्रश्न में कठिनाई अनुभव करता है, तो पहले इकाई और दहाई पर कार्य किया जा सकता है। यदि सरल जोड़ सही है लेकिन पुनर्गठन वाले प्रश्न गलत हैं, तो उस प्रक्रिया पर लक्षित अभ्यास दिया जा सकता है।

यह एक उदाहरणात्मक परीक्षण है। वास्तविक निदानात्मक परीक्षण विद्यार्थी की कक्षा, पाठ्यक्रम और आवश्यकताओं के अनुसार तैयार किया जाना चाहिए।

5.4.2 उपलब्धि परीक्षण की तैयारी (Preparation of Achievement Test)

उपलब्धि परीक्षण यह जाँचने के लिए तैयार किया जाता है कि विद्यार्थी ने निर्धारित पाठ या इकाई से संबंधित ज्ञान और कौशल किस सीमा तक प्राप्त किए हैं।

तैयारी के चरण:

  1. पाठ्यक्रम और अधिगम उद्देश्यों का अध्ययन।
  2. परीक्षण में शामिल विषयों की सूची तैयार करना।
  3. प्रश्नों के प्रकार और संख्या निर्धारित करना।
  4. कठिनाई स्तर का उचित संतुलन रखना।
  5. अंक-विभाजन और उत्तर कुंजी तैयार करना।
  6. स्पष्ट निर्देश देना।
  7. आवश्यकता के अनुसार सुलभ प्रारूप और उचित अनुकूलन करना।
  8. उत्तरों का विश्लेषण करके उपलब्धियों और कठिनाइयों की पहचान करना।

नमूना उपलब्धि परीक्षण

विषय: प्राथमिक स्तर पर गणित
कुल अंक: 10
समय: 20 मिनट

प्रश्न 1: सही उत्तर चुनिए। (2 अंक)

क. 8 + 7 =
(क) 13 (ख) 15 (ग) 16

ख. 20 − 9 =
(क) 9 (ख) 11 (ग) 12

प्रश्न 2: हल कीजिए। (4 अंक)

क. 24 + 13 =
ख. 35 − 12 =

प्रश्न 3: शब्द समस्या हल कीजिए। (2 अंक)

रीना के पास 12 पेंसिलें हैं। उसे 5 पेंसिलें और मिलती हैं। अब उसके पास कुल कितनी पेंसिलें हैं?

प्रश्न 4: गणितीय अवधारणा। (2 अंक)

एक आकृति बनाइए जिसमें चार भुजाएँ हों और उसका नाम लिखिए।

नमूना उत्तर कुंजी:

  • प्रश्न 1: 15 और 11।
  • प्रश्न 2: 37 और 23।
  • प्रश्न 3: 17 पेंसिलें।
  • प्रश्न 4: विद्यार्थी द्वारा बनाई गई उपयुक्त चार भुजाओं वाली आकृति, जैसे वर्ग या आयत।

यह परीक्षण एक नमूना है। इसे किसी वास्तविक विद्यार्थी पर लागू करने से पहले कक्षा स्तर, पाठ्यक्रम और निर्धारित अधिगम उद्देश्यों के अनुसार संशोधित करना चाहिए।

5.4.3 समग्र विकास रिपोर्ट कार्ड (Holistic Development Report Card)

समग्र विकास रिपोर्ट कार्ड एक ऐसा अभिलेख है जिसमें विद्यार्थी की उपलब्धियों, प्रगति, शक्तियों और आवश्यक सहायता का व्यवस्थित विवरण दिया जाता है।

विशेष शिक्षा में रिपोर्ट कार्ड स्पष्ट, सम्मानजनक और विद्यार्थी की वास्तविक प्रगति पर आधारित होना चाहिए। इसमें केवल कठिनाइयाँ लिखने के बजाय विद्यार्थी की उपलब्धियों और आगे के लक्ष्यों को भी शामिल करना चाहिए।

रिपोर्ट कार्ड का नमूना प्रारूप

विद्यार्थी का विवरण

  • विद्यार्थी का नाम: __________
  • कक्षा: __________
  • मूल्यांकन अवधि: __________
  • विषय: गणित
  • शिक्षक: __________
आकलन क्षेत्रप्रगति का विवरणआगे की आवश्यकता
संख्या पहचान____________________
जोड़ एवं घटाव____________________
गणितीय अवधारणाएँ____________________
समस्या समाधान____________________
गणितीय उपकरणों का उपयोग____________________
दैनिक जीवन में गणित का उपयोग____________________
स्वतंत्र कार्य____________________
सहभागिता एवं सहयोग____________________

विद्यार्थी की प्रमुख उपलब्धियाँ:


जिन क्षेत्रों में अतिरिक्त सहायता आवश्यक है:


अगली अवधि के अधिगम लक्ष्य:


शिक्षक की टिप्पणी:


अभिभावक के साथ साझा की गई जानकारी:


यह प्रारूप उदाहरण के लिए है। रिपोर्ट कार्ड में केवल वही जानकारी दर्ज करनी चाहिए जिसका व्यवस्थित आकलन किया गया हो।


5.5 Adaptations in Evaluation Including Techno-Based Evaluation for Students with Disabilities

दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए मूल्यांकन में अनुकूलन एवं तकनीक आधारित मूल्यांकन

5.5.1 मूल्यांकन में अनुकूलन का अर्थ (Meaning of Adaptations in Evaluation)

मूल्यांकन में अनुकूलन का अर्थ है विद्यार्थी की दिव्यांगता या व्यक्तिगत आवश्यकता के कारण उत्पन्न अनावश्यक बाधाओं को कम करने के लिए मूल्यांकन की प्रस्तुति, प्रक्रिया, समय, स्थान या उत्तर देने के तरीके में उपयुक्त बदलाव करना।

अनुकूलन का उद्देश्य विद्यार्थी को अपनी वास्तविक समझ और कौशल प्रदर्शित करने का अवसर देना है।

अनुकूलन का चयन निर्धारित अधिगम उद्देश्य, विद्यार्थी की आवश्यकता और लागू नियमों के अनुसार किया जाना चाहिए।

5.5.2 विभिन्न दिव्यांगताओं के संदर्भ में मूल्यांकन अनुकूलन

1. दृष्टिबाधित विद्यार्थी

संभावित अनुकूलन:

  • ब्रेल या सुलभ डिजिटल प्रश्नपत्र।
  • स्क्रीन रीडर या ब्रेल डिस्प्ले।
  • स्पर्शनीय आकृतियाँ और ग्राफ।
  • बोलकर प्रश्न प्रस्तुत करना, जहाँ उपयुक्त हो।
  • उत्तर देने के लिए सुलभ उपकरण।
  • आवश्यकतानुसार अतिरिक्त समय।

गणित में चित्र या ग्राफ आधारित प्रश्नों के लिए वैकल्पिक सुलभ प्रस्तुति तैयार करना आवश्यक हो सकता है।

2. कम दृष्टि वाले विद्यार्थी

संभावित अनुकूलन:

  • बड़े अक्षरों वाला प्रश्नपत्र।
  • स्पष्ट रंग-विरोध।
  • आवर्धक उपकरण।
  • उपयुक्त प्रकाश व्यवस्था।
  • बड़े और स्पष्ट ग्राफ।
  • सुलभ डिजिटल सामग्री।

3. श्रवणबाधित विद्यार्थी

संभावित अनुकूलन:

  • लिखित और दृश्य निर्देश।
  • प्रश्नों के स्पष्ट मुद्रित रूप।
  • आवश्यकता के अनुसार सांकेतिक भाषा सहायता।
  • वीडियो सामग्री में उपशीर्षक।
  • मौखिक निर्देशों के साथ लिखित स्पष्टीकरण।

4. चलन संबंधी दिव्यांगता वाले विद्यार्थी

संभावित अनुकूलन:

  • सुलभ परीक्षा कक्ष।
  • उपयुक्त बैठने की व्यवस्था।
  • आवश्यकतानुसार कंप्यूटर या वैकल्पिक इनपुट उपकरण।
  • लिखने में कठिनाई होने पर अनुमत वैकल्पिक उत्तर माध्यम।
  • आवश्यकतानुसार अतिरिक्त समय।

5. बौद्धिक दिव्यांगता वाले विद्यार्थी

संभावित अनुकूलन:

  • सरल और स्पष्ट निर्देश।
  • छोटे-छोटे प्रश्न या कार्य चरण।
  • दृश्य संकेत और ठोस सामग्री, जहाँ उद्देश्य के अनुरूप हो।
  • समझ की जाँच के लिए निर्देशों की स्पष्ट प्रस्तुति।
  • आवश्यकता के अनुसार अतिरिक्त समय और विराम।
  • विद्यार्थी के निर्धारित अधिगम लक्ष्यों के अनुसार आकलन।

6. विशिष्ट अधिगम अक्षमता वाले विद्यार्थी

संभावित अनुकूलन:

  • स्पष्ट रूप से व्यवस्थित प्रश्नपत्र।
  • पर्याप्त स्थान और पढ़ने योग्य अक्षर।
  • प्रश्नों के निर्देशों को सरल रूप में प्रस्तुत करना।
  • आवश्यकता और लागू नियमों के अनुसार अतिरिक्त समय।
  • उपयुक्त गणितीय उपकरणों का उपयोग, यदि वे जाँचे जा रहे कौशल को प्रतिस्थापित नहीं करते।
  • गणना की प्रक्रिया और अवधारणात्मक समझ को अलग-अलग देखने के अवसर।

किसी भी विद्यार्थी के लिए अनुकूलन उसकी वास्तविक आवश्यकता और लागू दिशा-निर्देशों के आधार पर तय होना चाहिए; केवल दिव्यांगता के नाम के आधार पर एक जैसा अनुकूलन मान लेना उचित नहीं है।

5.5.3 तकनीक आधारित मूल्यांकन (Techno-Based Evaluation)

तकनीक आधारित मूल्यांकन में डिजिटल उपकरणों, कंप्यूटर, टैबलेट, शैक्षिक सॉफ्टवेयर और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की सहायता से विद्यार्थियों की गणितीय उपलब्धियों का आकलन किया जाता है।

प्रमुख माध्यम:

1. डिजिटल क्विज: बहुविकल्पीय प्रश्नों और छोटे परीक्षणों के माध्यम से त्वरित प्रतिक्रिया प्राप्त करना।

2. ऑनलाइन कार्यपत्रक: गणना, अवधारणाओं और समस्या समाधान का अभ्यास तथा मूल्यांकन।

3. शैक्षिक सॉफ्टवेयर: ज्यामिति, ग्राफ और गणितीय प्रक्रियाओं का आकलन।

4. डिजिटल पोर्टफोलियो: विद्यार्थी के कार्यों और प्रगति का रिकॉर्ड रखना।

5. कंप्यूटर आधारित परीक्षण: डिजिटल प्रश्नपत्र के माध्यम से निर्धारित कौशलों का आकलन।

6. सहायक प्रौद्योगिकी: स्क्रीन रीडर, आवर्धन और वैकल्पिक इनपुट उपकरणों के माध्यम से सुलभ मूल्यांकन।

तकनीक आधारित मूल्यांकन के लाभ

  • शीघ्र प्रतिक्रिया।
  • परिणामों का व्यवस्थित अभिलेखन।
  • अभ्यास को दोहराने की सुविधा।
  • विभिन्न प्रकार के प्रश्नों का उपयोग।
  • सुलभता सुविधाओं के माध्यम से भागीदारी के अवसर।
  • शिक्षक को प्रगति और त्रुटियों का विश्लेषण करने में सहायता।

सीमाएँ और सावधानियाँ

  • सभी विद्यार्थियों के पास डिजिटल उपकरण या इंटरनेट उपलब्ध नहीं हो सकते।
  • कुछ प्लेटफॉर्म स्क्रीन रीडर या अन्य सहायक तकनीक के साथ पूरी तरह काम नहीं करते।
  • तकनीकी समस्या परिणामों को प्रभावित कर सकती है।
  • डिजिटल परीक्षण में गोपनीयता और डेटा सुरक्षा का ध्यान रखना चाहिए।
  • केवल स्वचालित अंकन के आधार पर विद्यार्थी की पूरी गणितीय समझ का निर्णय नहीं लेना चाहिए।
  • आवश्यकता होने पर वैकल्पिक ऑफलाइन या गैर-डिजिटल आकलन उपलब्ध होना चाहिए।

5.5.4 समावेशी मूल्यांकन की प्रक्रिया (Procedure for Inclusive Evaluation)

समावेशी मूल्यांकन की योजना बनाते समय निम्न प्रक्रिया अपनाई जा सकती है:

  1. अधिगम उद्देश्य स्पष्ट करना।
  2. यह निर्धारित करना कि किस ज्ञान या कौशल का आकलन करना है।
  3. उपयुक्त आकलन उपकरण और प्रश्नों का चयन करना।
  4. विद्यार्थी की आवश्यकताओं और संभावित बाधाओं की पहचान करना।
  5. आवश्यक अनुकूलन और सहायक संसाधन निर्धारित करना।
  6. सुलभ निर्देश और उत्तर देने के अवसर उपलब्ध कराना।
  7. विद्यार्थी के प्रदर्शन और प्रक्रिया का व्यवस्थित अभिलेखन करना।
  8. परिणामों का विश्लेषण करना।
  9. विद्यार्थी को उपयोगी प्रतिक्रिया देना।
  10. आवश्यकतानुसार शिक्षण योजना और सुधारात्मक सहायता में बदलाव करना।

उदाहरण: यदि उद्देश्य विद्यार्थी की जोड़ संबंधी अवधारणा जाँचना है, तो विद्यार्थी उपयुक्त परिस्थिति में ठोस सामग्री, संख्या रेखा या अनुमत डिजिटल उपकरण की सहायता से उत्तर दे सकता है। लेकिन यदि उद्देश्य मानसिक गणना की दक्षता जाँचना है, तो उपकरण के उपयोग से संबंधित नियमों को स्पष्ट रूप से निर्धारित करना आवश्यक होगा।


इकाई 5 का सारांश (Summary)

इस इकाई में गणित अधिगम के लिए आकलन एवं मूल्यांकन की अवधारणा, महत्त्व, उद्देश्य और लचीलेपन का अध्ययन किया गया।

त्रुटि विश्लेषण और निदानात्मक परीक्षण विद्यार्थियों की कठिनाइयों को पहचानने में सहायता करते हैं। कठिन अधिगम बिंदुओं की पहचान के बाद सुधारात्मक शिक्षण, अतिरिक्त अभ्यास और वैकल्पिक शिक्षण संसाधनों का उपयोग किया जा सकता है।

रचनात्मक आकलन शिक्षण के दौरान प्रगति और सुधार पर केंद्रित होता है, जबकि संकलनात्मक आकलन निर्धारित अवधि के अंत में उपलब्धियों की समीक्षा करता है। लिखित परीक्षण, मौखिक प्रश्न, अवलोकन सूची, रूब्रिक, पोर्टफोलियो और परियोजना कार्य गणित में उपयोगी आकलन उपकरण हैं।

निदानात्मक परीक्षण, उपलब्धि परीक्षण और समग्र विकास रिपोर्ट कार्ड तैयार करते समय स्पष्ट उद्देश्यों, उपयुक्त प्रश्नों और निष्पक्ष मानदंडों का उपयोग आवश्यक है। दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए सुलभ प्रारूप, उपयुक्त अतिरिक्त समय, सहायक तकनीक और वैकल्पिक उत्तर माध्यम जैसे अनुकूलन उनकी वास्तविक उपलब्धियों को प्रदर्शित करने में सहायता कर सकते हैं।

महत्त्वपूर्ण परीक्षा प्रश्न (Important Questions)

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

  1. गणित में आकलन एवं मूल्यांकन की अवधारणा, महत्त्व और उद्देश्यों की व्याख्या कीजिए।
  2. आकलन और मूल्यांकन में अंतर स्पष्ट कीजिए।
  3. त्रुटि विश्लेषण का अर्थ, प्रकार और प्रक्रिया उदाहरण सहित समझाइए।
  4. निदानात्मक परीक्षण क्या है? इसके निर्माण के चरणों का वर्णन कीजिए।
  5. गणित में रचनात्मक एवं संकलनात्मक आकलन की तुलना कीजिए।
  6. गणित में आकलन के प्रमुख उपकरणों और तकनीकों का वर्णन कीजिए।
  7. निदानात्मक परीक्षण और उपलब्धि परीक्षण तैयार करने की प्रक्रिया समझाइए।
  8. समग्र विकास रिपोर्ट कार्ड का प्रारूप तैयार कीजिए।
  9. दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए मूल्यांकन में आवश्यक अनुकूलनों की व्याख्या कीजिए।
  10. गणित में तकनीक आधारित मूल्यांकन के लाभ, सीमाएँ और सावधानियाँ लिखिए।

लघु उत्तरीय प्रश्न

  1. आकलन क्या है?
  2. मूल्यांकन क्या है?
  3. रचनात्मक आकलन का एक उदाहरण दीजिए।
  4. संकलनात्मक आकलन का उद्देश्य क्या है?
  5. त्रुटि विश्लेषण क्यों आवश्यक है?
  6. कठिन अधिगम बिंदु से क्या तात्पर्य है?
  7. उपचारात्मक शिक्षण क्या है?
  8. रूब्रिक क्या है?
  9. पोर्टफोलियो आकलन क्या है?
  10. तकनीक आधारित मूल्यांकन के दो लाभ लिखिए।
  11. मूल्यांकन में लचीलेपन का क्या अर्थ है?
  12. समग्र विकास रिपोर्ट कार्ड में किन क्षेत्रों को शामिल किया जा सकता है?

अभ्यास प्रश्न (Practice Questions)

प्रश्न 1: विद्यार्थी जोड़ के प्रश्न सही हल करता है, लेकिन स्थानमान संबंधी प्रश्नों में बार-बार गलती करता है। शिक्षक को किस प्रकार का आकलन करना चाहिए?

प्रश्न 2: शिक्षण के दौरान छोटे प्रश्नों और प्रतिक्रिया के माध्यम से प्रगति जाँचना किस प्रकार के आकलन का उदाहरण है?

प्रश्न 3: किसी विद्यार्थी को गणितीय ग्राफ समझने के लिए स्पर्शनीय ग्राफ उपलब्ध कराना किस प्रकार के अनुकूलन का उदाहरण है?

प्रश्न 4: निदानात्मक परीक्षण और उपलब्धि परीक्षण में दो अंतर लिखिए।

प्रश्न 5: गणितीय आकलन में सहायक प्रौद्योगिकी की क्या भूमिका हो सकती है?

निष्कर्ष (Conclusion)

प्रभावी गणित शिक्षण के लिए आकलन एवं मूल्यांकन को अधिगम सुधारने की प्रक्रिया के रूप में देखना आवश्यक है। उपयुक्त आकलन विद्यार्थियों की उपलब्धियों के साथ-साथ उनकी कठिनाइयों और आवश्यक सहायता को समझने में मदद करता है।

विशेष शिक्षा में लचीला, सुलभ और उद्देश्य आधारित मूल्यांकन विद्यार्थियों को अपनी वास्तविक क्षमताएँ प्रदर्शित करने के अवसर प्रदान करता है। त्रुटि विश्लेषण, निदानात्मक परीक्षण, उपचारात्मक शिक्षण और तकनीक आधारित संसाधनों का उचित उपयोग गणितीय अधिगम को अधिक प्रभावी और समावेशी बना सकता है।

अध्ययन सामग्री: Notes4SpecialEducation
विषय: B.Ed. Special Education – Pedagogy of Teaching Mathematics, Unit 5

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