प्रस्तावना
मानव जीवन में भाषा का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। भाषा केवल विचारों के आदान-प्रदान का साधन मात्र नहीं है, बल्कि यह मानव के बौद्धिक, सांस्कृतिक और सामाजिक विकास की आधारशिला है। जन्म लेने के उपरांत बालक अपने परिवार और समाज से स्वाभाविक रूप से मातृभाषा सीख लेता है, जिसे भाषा अर्जन कहा जाता है। परंतु, जब उसी भाषा को विद्यालयी परिवेश में व्याकरणिक नियमों, साहित्यिक विधाओं और शुद्ध उच्चारण के साथ एक व्यवस्थित रूप में सीखा जाता है, तो वह ‘भाषा अधिगम’ कहलाता है।
भाषा अधिगम एक जटिल मनोवैज्ञानिक और मानसिक प्रक्रिया है। किसी भी भाषा, विशेषकर हिन्दी जैसी समृद्ध और वैज्ञानिक भाषा को सिखाने के लिए शिक्षक को पूर्व तैयारी करनी पड़ती है। एक सफल शिक्षक कक्षा में जाने से पूर्व यह निर्धारित करता है कि उसे विद्यार्थियों को क्या पढ़ाना है, क्यों पढ़ाना है और कैसे पढ़ाना है। इसी पूर्व तैयारी को शिक्षा शास्त्र की भाषा में ‘नियोजन’ या योजना निर्माण कहा जाता है। प्रस्तुत लेख में हम हिन्दी भाषा शिक्षण के लक्ष्यों, उद्देश्यों, इकाई नियोजन और दैनिक पाठ योजना के निर्माण तथा उसके क्रियान्वयन पर अत्यंत विस्तार से दृष्टांतों सहित चर्चा करेंगे।
१. हिन्दी शिक्षण के लक्ष्य और उद्देश्य
शिक्षण एक सोद्देश्य प्रक्रिया है। बिना उद्देश्य के कोई भी कार्य दिशाहीन होता है। शिक्षा जगत में ‘लक्ष्य’ और ‘उद्देश्य’ को प्रायः एक ही मान लिया जाता है, परंतु इनमें सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक अंतर है।
लक्ष्य: लक्ष्य अत्यंत व्यापक होते हैं। इनकी प्राप्ति के लिए दीर्घकालीन समय की आवश्यकता होती है। सम्पूर्ण शिक्षा व्यवस्था और संपूर्ण विद्यालयी जीवन मिलकर इन लक्ष्यों की प्राप्ति की दिशा में कार्य करते हैं। उदाहरण के लिए— ‘विद्यार्थी का सर्वांगीण विकास करना’ या ‘विद्यार्थी को एक आदर्श और नैतिक नागरिक बनाना’ शिक्षा के लक्ष्य हैं।
उद्देश्य: उद्देश्य विशिष्ट, तात्कालिक और संकुचित होते हैं। इनकी प्राप्ति एक निर्धारित समय-सीमा (जैसे एक कालांश या एक कक्षा) में की जा सकती है। यह किसी एक विषय या एक पाठ से जुड़े होते हैं।
हिन्दी भाषा शिक्षण के प्रमुख लक्ष्य: हिन्दी भारत की संपर्क भाषा और राजभाषा है। इसके शिक्षण के निम्नलिखित व्यापक लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं:
- भाव-ग्रहण क्षमता का विकास: विद्यार्थी दूसरों द्वारा कही गई बातों को सुनकर और लिखी गई बातों को पढ़कर उसका सही अर्थ समझ सकें।
- भाव-अभिव्यक्ति क्षमता का विकास: विद्यार्थी अपने विचारों, अनुभूतियों और भावनाओं को मौखिक रूप से (बोलकर) तथा लिखित रूप से (लिखकर) शुद्ध, स्पष्ट और प्रभावशाली ढंग से व्यक्त कर सकें।
- साहित्यिक और सांस्कृतिक चेतना का विकास: हिन्दी साहित्य (कविता, कहानी, नाटक आदि) के अध्ययन के माध्यम से विद्यार्थियों में भारतीय संस्कृति, जीवन मूल्यों, परंपराओं और उच्च आदर्शों के प्रति सम्मान की भावना जाग्रत करना।
- सृजनात्मकता और कल्पना शक्ति का विकास: विद्यार्थियों की मौलिक सोच को बढ़ावा देना ताकि वे स्वयं भी कविता, कहानी या निबंध की रचना कर सकें।
२. हिन्दी शिक्षण के ज्ञानात्मक, बोधात्मक, कौशलात्मक और रुचिगत उद्देश्यों का निर्धारण
कक्षा-कक्ष में जब शिक्षक कोई विशिष्ट पाठ (जैसे कोई कहानी या कविता) पढ़ाता है, तो वह कुछ निश्चित शैक्षिक उद्देश्यों को लेकर चलता है। प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री बेंजामिन ब्लूम ने शैक्षिक उद्देश्यों का मनोवैज्ञानिक वर्गीकरण किया है। हिन्दी शिक्षण के अंतर्गत इन विशिष्ट उद्देश्यों को चार मुख्य भागों में बाँटा गया है। प्रत्येक उद्देश्य के साथ विद्यार्थियों में कुछ ‘अपेक्षित व्यवहारगत परिवर्तन’ आते हैं।
क. ज्ञानात्मक उद्देश्य ज्ञान का तात्पर्य किसी विषय-वस्तु की जानकारी प्राप्त करना, उसे पहचानना और स्मरण रखना है। हिन्दी भाषा शिक्षण में इसका अर्थ भाषा के मूल तत्वों और साहित्य की विधाओं से परिचित होना है।
- अपेक्षित व्यवहारगत परिवर्तन:
- विद्यार्थी हिन्दी वर्णमाला, ध्वनियों, शब्दों और वाक्य रचना के नियमों का प्रत्यास्मरण (याद करना) कर सकेंगे।
- विद्यार्थी पाठ में आए हुए नवीन और कठिन शब्दों, मुहावरों तथा लोकोक्तियों का ज्ञान प्राप्त कर सकेंगे।
- विद्यार्थी विभिन्न रचनाकारों (कवियों, लेखकों) के नाम और उनकी प्रमुख रचनाओं को पहचान सकेंगे।
- विद्यार्थी कहानी, नाटक, संस्मरण, आत्मकथा आदि विभिन्न गद्य विधाओं की जानकारी प्राप्त कर सकेंगे।
- दृष्टांत (उदाहरण): यदि शिक्षक मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘ईदगाह’ पढ़ा रहा है, तो ज्ञानात्मक उद्देश्य यह होगा कि विद्यार्थी यह जान सकें कि यह कहानी किसने लिखी है और इसमें ‘चिमटा’, ‘दुआ’ जैसे शब्दों का शाब्दिक अर्थ क्या है।
ख. बोधात्मक (अर्थग्रहण संबंधी) उद्देश्य केवल रट लेना या जानकारी प्राप्त कर लेना पर्याप्त नहीं है। बोध का अर्थ है सीखी गई विषय-वस्तु को गहराई से समझना और उसे अपने शब्दों में ढालने की क्षमता विकसित करना।
- अपेक्षित व्यवहारगत परिवर्तन:
- विद्यार्थी सुनकर या पढ़कर पाठ के केंद्रीय भाव या मूल संदेश को समझ सकेंगे।
- विद्यार्थी पाठ्य सामग्री की व्याख्या अपने शब्दों में कर सकेंगे।
- विद्यार्थी दो समानार्थक अथवा विपरीतार्थक शब्दों के बीच का अंतर स्पष्ट कर सकेंगे।
- विद्यार्थी पूरी कहानी या निबंध का सारांश (संक्षिप्त रूप) प्रस्तुत कर सकेंगे।
- दृष्टांत (उदाहरण): ‘ईदगाह’ कहानी पढ़ने के पश्चात यदि विद्यार्थी यह बता सके कि हामिद ने खिलौने के स्थान पर अपनी दादी के लिए चिमटा क्यों खरीदा और इस घटना के पीछे का मनोवैज्ञानिक भाव क्या था, तो इसका अर्थ है कि उसने बोधात्मक उद्देश्य प्राप्त कर लिया है।
ग. कौशलात्मक (प्रयोगात्मक) उद्देश्य कौशल का अर्थ है निपुणता या दक्षता। प्राप्त किए गए भाषाई ज्ञान और बोध को व्यावहारिक जीवन में उपयोग करना ही कौशलात्मक उद्देश्य है। इसके अंतर्गत भाषा के चार प्रमुख कौशल आते हैं— श्रवण (सुनना), वाचन (बोलना), पठन (पढ़ना) और लेखन (लिखना)।
- अपेक्षित व्यवहारगत परिवर्तन:
- विद्यार्थी उचित हाव-भाव, आरोह-अवरोह और गति के साथ कविता का सस्वर वाचन कर सकेंगे।
- विद्यार्थी शुद्ध उच्चारण के साथ धाराप्रवाह हिन्दी बोल सकेंगे।
- विद्यार्थी बिना किसी व्याकरणिक और वर्तनी की अशुद्धि के अपने विचारों को लिखित रूप दे सकेंगे।
- विद्यार्थी वक्ता की बात को ध्यानपूर्वक सुनकर उस पर अपनी त्वरित और सटीक प्रतिक्रिया दे सकेंगे।
- दृष्टांत (उदाहरण): विद्यार्थी जब ‘वीर रस’ की कोई कविता पढ़े, तो उसकी आवाज़ में ओज और उत्साह झलकना चाहिए। यदि वह ऐसा कर पाता है, तो उसमें पठन और वाचन कौशल का विकास हो गया है।
घ. रुचिगत और अभिवृत्यात्मक उद्देश्य यह उद्देश्य विद्यार्थियों की भावनाओं, प्रवृत्तियों और दृष्टिकोण से जुड़ा है। इसका लक्ष्य विद्यार्थियों के मन में साहित्य के प्रति अगाध प्रेम और राष्ट्रभाषा के प्रति सम्मान उत्पन्न करना है।
- अपेक्षित व्यवहारगत परिवर्तन:
- विद्यार्थियों की हिन्दी साहित्य पढ़ने में सहज रुचि जाग्रत होगी। वे अपने खाली समय में पुस्तकालय जाकर पत्र-पत्रिकाएं और कहानियों की पुस्तकें पढ़ेंगे।
- विद्यार्थी विद्यालय में होने वाली साहित्यिक गतिविधियों (जैसे वाद-विवाद प्रतियोगिता, कवि-सम्मेलन, नाटक मंचन) में उत्साहपूर्वक भाग लेंगे।
- विद्यार्थियों में अच्छे साहित्यकारों के प्रति श्रद्धा और अपनी संस्कृति के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण (सकारात्मक अभिवृत्ति) का विकास होगा।
- दृष्टांत (उदाहरण): कक्षा में कबीरदास जी के दोहे पढ़ने के पश्चात यदि विद्यार्थी घर जाकर कबीर के अन्य दोहों को स्वयं खोजकर पढ़ता है, तो इसका तात्पर्य है कि शिक्षक रुचिगत उद्देश्य की प्राप्ति में सफल रहा है।
३. इकाई नियोजन: प्रत्यय, महत्व और निर्माण-विधि
अध्यापन कार्य को सुव्यवस्थित और प्रभावपूर्ण बनाने के लिए योजना बनाना अनिवार्य है। योजना के दो मुख्य रूप होते हैं— इकाई नियोजन और दैनिक पाठ योजना।
इकाई नियोजन का प्रत्यय (संकल्पना) इकाई नियोजन का मनोवैज्ञानिक आधार ‘समग्रता का सिद्धांत’ है। मनोविज्ञान की एक शाखा यह मानती है कि मनुष्य का मस्तिष्क किसी भी ज्ञान को छोटे-छोटे टुकड़ों में ग्रहण करने के बजाय उसे एक ‘संपूर्ण’ रूप में ग्रहण करता है। संपूर्ण पाठ्यक्रम अत्यंत विशाल होता है। जब पाठ्यक्रम के अंतर्गत समान विषय-वस्तु, समान उद्देश्य या एक ही विचारधारा वाले कई पाठों को एक समूह में एकत्रित कर लिया जाता है, तो उस समूह को ‘इकाई’ कहा जाता है। उदाहरण के लिए, यदि हिन्दी की पाठ्यपुस्तक में तीन अलग-अलग कविताएं हैं— एक ‘वसंत ऋतु’ पर, दूसरी ‘वर्षा ऋतु’ पर और तीसरी ‘हिमालय की सुंदरता’ पर। शिक्षक इन तीनों पाठों को मिलाकर एक इकाई बना सकता है और उस इकाई का नाम ‘प्रकृति वर्णन’ रख सकता है। इस पूरी इकाई को पढ़ाने के लिए वह दो या तीन सप्ताह की एक विस्तृत योजना बनाएगा, जिसे इकाई योजना कहा जाएगा।
इकाई नियोजन का महत्व
- विषय-वस्तु की क्रमबद्धता: इससे संपूर्ण पाठ्य सामग्री एक तार्किक और मनोवैज्ञानिक क्रम में व्यवस्थित हो जाती है। ज्ञान बिखरा हुआ प्रतीत नहीं होता।
- समय और ऊर्जा की बचत: एक समान पाठों को एक साथ पढ़ाने से बार-बार नई पृष्ठभूमि नहीं बनानी पड़ती। शिक्षक को ज्ञात होता है कि आगामी दस-पंद्रह दिनों में उसे क्या और कैसे पढ़ाना है।
- स्थायी ज्ञान: जब विद्यार्थी समान प्रकृति वाले विषयों को एक साथ जोड़कर पढ़ते हैं, तो उन्हें विषय की गहराई समझ में आती है और ज्ञान उनके मस्तिष्क में स्थायी हो जाता है।
- मूल्यांकन में सरलता: एक पूरी इकाई समाप्त होने के पश्चात शिक्षक उस संपूर्ण इकाई का एक सम्मिलित परीक्षण ले सकता है, जिससे विद्यार्थियों की प्रगति का सही आकलन होता है।
इकाई नियोजन की निर्माण-विधि एक आदर्श इकाई योजना का निर्माण करते समय शिक्षक को निम्नलिखित चरणों से गुजरना पड़ता है: १. इकाई का चयन और नामकरण: सर्वप्रथम पूरे पाठ्यक्रम का गहन विश्लेषण किया जाता है। एक समान प्रकृति वाले पाठों को छांटकर उनका एक समूह बनाया जाता है और उस इकाई को एक उपयुक्त शीर्षक दिया जाता है (जैसे— ‘राष्ट्रीयता की भावना’, ‘नीतिपरक दोहे’ आदि)। २. उद्देश्यों का निर्धारण: इस चरण में शिक्षक यह तय करता है कि इस संपूर्ण इकाई को पढ़ाने के पश्चात विद्यार्थियों में कौन-से ज्ञानात्मक, बोधात्मक और कौशलात्मक परिवर्तन लाए जाने हैं। ३. विषय-वस्तु का उप-विभाजन: चूंकि एक इकाई को एक ही दिन में नहीं पढ़ाया जा सकता, इसलिए उसे दैनिक पाठों या छोटे-छोटे खण्डों में विभाजित किया जाता है। यह तय किया जाता है कि किस दिन कौन-सा अंश पढ़ाया जाएगा। ४. शिक्षण विधियों और सहायक सामग्री का चुनाव: शिक्षक यह निर्धारित करता है कि इस इकाई के विभिन्न अंशों को पढ़ाने के लिए वह किन विधियों (जैसे— व्याख्यान विधि, प्रश्नोत्तर विधि, कहानी कथन विधि) का प्रयोग करेगा। साथ ही, कौन-सी दृश्य-श्रव्य सामग्री (चित्र, मानचित्र, प्रतिरूप, श्यामपट्ट) का उपयोग किया जाएगा। ५. मूल्यांकन प्रक्रिया का निर्धारण: इकाई के अंत में विद्यार्थियों का मूल्यांकन किस प्रकार किया जाएगा— मौखिक प्रश्न पूछे जाएंगे, लिखित परीक्षा ली जाएगी या कोई रचनात्मक कार्य सौंपा जाएगा, इसकी रूपरेखा पहले ही तैयार कर ली जाती है।
४. पाठयोजना का परिचय, उपयोग और महत्व
इकाई योजना एक दीर्घकालिक योजना है जो कई दिनों या सप्ताहों के लिए बनाई जाती है। परंतु, एक शिक्षक को प्रतिदिन एक निश्चित समय अवधि (लगभग पैंतीस से चालीस मिनट) के लिए कक्षा में जाना होता है। उस एक विशिष्ट कालांश (समय-खंड) की योजना को ‘पाठ योजना’ कहा जाता है।
पाठ योजना का परिचय कक्षा-कक्ष में प्रवेश करने से पूर्व शिक्षक द्वारा यह तय करना कि आज उसे कौन-सा विषय पढ़ाना है, किन उद्देश्यों की प्राप्ति करनी है, कौन-सी सहायक सामग्री का उपयोग करना है, विद्यार्थियों से कौन-से प्रश्न पूछने हैं और मूल्यांकन कैसे करना है— इन सभी बातों के लिखित और व्यवस्थित विवरण को ही ‘पाठ योजना’ कहते हैं। सरल शब्दों में, पाठ योजना शिक्षक का वह मार्गदर्शक चित्र है जो उसे बताता है कि कक्षा की शुरुआत कहाँ से करनी है और उसका अंत कहाँ और कैसे करना है।
पाठ योजना की उपयोगिता और शिक्षण में महत्व
१. आत्मविश्वास का संचार: जब शिक्षक पूरी तैयारी और एक लिखित रूपरेखा के साथ कक्षा में प्रवेश करता है, तो उसके भीतर अपार आत्मविश्वास होता है। वह विषय-वस्तु को बिना किसी हिचकिचाहट के स्पष्टता से प्रस्तुत कर पाता है।
२. उद्देश्यपूर्ण शिक्षण: बिना योजना के शिक्षक प्रायः मुख्य विषय से भटक जाते हैं। पाठ योजना शिक्षक को विषय-वस्तु तक सीमित रखती है, जिससे शिक्षण कार्य भटकाव से बचता है और पूर्व-निर्धारित उद्देश्यों की पूर्ति होती है।
३. समय का समुचित उपयोग: कक्षा के चालीस मिनट के समय को पाठ योजना के माध्यम से उचित रूप में विभाजित कर लिया जाता है (जैसे— पाँच मिनट पूर्व-ज्ञान परीक्षण के लिए, पच्चीस मिनट नए ज्ञान को पढ़ाने के लिए, और दस मिनट सारांश तथा प्रश्नों के लिए)।
४. विद्यार्थियों की सक्रिय सहभागिता: योजना बनाते समय शिक्षक यह पहले ही तय कर लेता है कि वह किस बिंदु पर विद्यार्थियों से प्रश्न पूछेगा या उनसे कोई गतिविधि कराएगा। इससे कक्षा में नीरसता नहीं आती और विद्यार्थी पूरी तरह से सक्रिय रहते हैं।
५. अनुशासन की स्थापना: एक व्यवस्थित और रोचक कक्षा में विद्यार्थी शिक्षण कार्य में इतने मग्न हो जाते हैं कि अनुशासनहीनता की कोई गुंजाइश ही नहीं बचती। शिक्षक का निरंतर विषय पर केंद्रित रहना कक्षा में शांति बनाए रखता है।
५. पाठयोजना के चरण, संरचना, उपागम और उनका क्रियान्वयन
शिक्षा शास्त्रियों ने पाठ योजना निर्माण के लिए कई दृष्टिकोण या उपागम प्रस्तुत किए हैं। परंतु भारतीय शिक्षण व्यवस्था और विशेष रूप से हिन्दी भाषा शिक्षण में सर्वाधिक प्रचलित और मनोवैज्ञानिक उपागम ‘हर्बर्ट की पंचपदीय प्रणाली’ है।
प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री जे.एफ. हर्बर्ट ने शिक्षण प्रक्रिया को मनोवैज्ञानिक आधार प्रदान किया। उनके अनुसार नया ज्ञान तभी स्थायी होता है जब उसे विद्यार्थियों के पुराने ज्ञान से जोड़कर पढ़ाया जाए। उन्होंने पाठ योजना के मुख्य पाँच चरण बताए हैं। आइए इनकी संरचना और कक्षा में इनके क्रियान्वयन को विस्तार से समझें:
चरण १: प्रस्तावना (पूर्व-ज्ञान परीक्षण) यह पाठ योजना का प्रथम और सर्वाधिक महत्वपूर्ण सोपान है। इसका मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों के पूर्व-ज्ञान (जो वे पहले से जानते हैं) का पता लगाना और उन्हें नए पाठ के लिए मानसिक रूप से तत्पर करना है।
- क्रियान्वयन: शिक्षक सीधे कक्षा में जाकर यह नहीं कहता कि “आज हम यह पाठ पढ़ेंगे।” वह विद्यार्थियों से उनके दैनिक जीवन और पूर्व-ज्ञान से जुड़े तीन या चार अत्यंत सरल प्रश्न पूछता है। प्रश्नों का क्रम ऐसा होता है कि पहले प्रश्न के उत्तर से दूसरा प्रश्न निकलता है। अंतिम प्रश्न ‘समस्यात्मक’ होता है, जिसका उत्तर विद्यार्थियों को ज्ञात नहीं होता। इसी समस्यात्मक बिंदु से नए पाठ का जन्म होता है।
- उद्देश्य कथन: समस्यात्मक प्रश्न प्रस्तुत करने के पश्चात शिक्षक नए पाठ की उद्घोषणा करता है। जैसे— “विद्यार्थियों, आज हम महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ द्वारा रचित कविता ‘ध्वनि’ का विस्तारपूर्वक अध्ययन करेंगे।”
चरण २: प्रस्तुतीकरण यह पाठ योजना का मध्य और सबसे विस्तृत भाग है, जहाँ नवीन ज्ञान को विद्यार्थियों के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। हिन्दी शिक्षण (विशेषकर गद्य और पद्य शिक्षण) में इस चरण को कई उप-भागों में बाँटा जाता है:
- क्रियान्वयन के उप-चरण:
- आदर्श वाचन: सर्वप्रथम शिक्षक स्वयं अत्यंत शुद्ध उच्चारण, उचित हाव-भाव, आरोह-अवरोह और विराम चिह्नों का ध्यान रखते हुए पाठ या कविता का वाचन करता है। विद्यार्थी उसे ध्यानपूर्वक सुनते हैं।
- अनुकरण वाचन: इसके पश्चात शिक्षक कक्षा के कुछ विद्यार्थियों को खड़ा करके वैसा ही वाचन करने का निर्देश देता है जैसा उसने किया था। यदि विद्यार्थी उच्चारण में कोई त्रुटि करते हैं, तो शिक्षक उसे सुधारता है।
- काठिन्य निवारण (शब्दार्थ ज्ञान): पाठ में आए हुए कठिन और अपरिचित शब्दों के अर्थ शिक्षक द्वारा श्यामपट्ट पर लिखे जाते हैं। इसके लिए वह विद्यार्थियों का सहयोग भी ले सकता है (जैसे पर्यायवाची या विलोम पूछकर अर्थ स्पष्ट करना)।
- विचार-विश्लेषण (व्याख्या और प्रश्न): शिक्षक पाठ के प्रत्येक अनुच्छेद या पद्यांश की विस्तृत व्याख्या करता है। विद्यार्थियों को विषय समझ में आ रहा है या नहीं, यह जाँचने के लिए वह बीच-बीच में ‘बोध प्रश्न’ पूछता रहता है।
चरण ३: तुलना एवं साहचर्य सीखे गए नवीन ज्ञान को स्पष्ट और अधिक सुदृढ़ बनाने के लिए शिक्षक उसकी तुलना विद्यार्थियों के पूर्व-ज्ञान या किसी अन्य समान प्रसंग से करता है।
- क्रियान्वयन: मान लीजिए शिक्षक ‘मातृभूमि के प्रति प्रेम’ की कोई कविता पढ़ा रहा है। इस चरण में वह उस कविता की तुलना पूर्व में पढ़ाई गई सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता ‘झांसी की रानी’ से कर सकता है। इससे विद्यार्थियों के मस्तिष्क में देशभक्ति का विचार अधिक गहराई से स्थापित हो जाएगा। व्याकरण शिक्षण में भी समान नियमों वाले उदाहरणों की तुलना की जाती है।
चरण ४: सामान्यीकरण यह वह चरण है जहाँ विद्यार्थी विशिष्ट उदाहरणों या पाठ्य-सामग्री के आधार पर स्वयं किसी सामान्य नियम, निष्कर्ष या मूल भाव तक पहुँचते हैं।
- क्रियान्वयन: व्याकरण पढ़ाते समय, कई उदाहरण प्रस्तुत करने के पश्चात विद्यार्थी स्वयं नियम बताते हैं। (जैसे— “जिन शब्दों से किसी कार्य के करने या होने का बोध हो, उसे क्रिया कहते हैं”)। साहित्य के पाठ में, विद्यार्थी पूरी कहानी सुनने के बाद स्वयं निष्कर्ष निकालते हैं कि उस कहानी से उन्हें क्या नैतिक शिक्षा मिली।
चरण ५: प्रयोग एवं पुनरावृत्ति इस अंतिम चरण में यह जाँचा जाता है कि पाठ के प्रारंभ में शिक्षक ने जो उद्देश्य निर्धारित किए थे, वे प्राप्त हुए हैं या नहीं। सीखे गए ज्ञान का अभ्यास कराया जाता है।
- क्रियान्वयन के उप-चरण:
- पुनरावृत्ति प्रश्न: शिक्षक पूरे पाठ को आधार बनाकर चार-पाँच संक्षिप्त मूल्यांकन प्रश्न पूछता है। इन प्रश्नों के उत्तर से पता चल जाता है कि विद्यार्थियों ने पाठ को कितना समझा है।
- श्यामपट्ट कार्य का सारांश: पूरी कक्षा के दौरान शिक्षक ने श्यामपट्ट पर जो कठिन शब्द, मुख्य बिंदु या व्याकरण के नियम लिखे थे, वह विद्यार्थियों को अपनी उत्तर-पुस्तिका में उतारने का निर्देश देता है।
- गृहकार्य: ज्ञान को स्थायी बनाने और अभ्यास के लिए विद्यार्थियों को घर से करके लाने के लिए कार्य दिया जाता है। गृहकार्य केवल रटने वाला नहीं होना चाहिए, बल्कि उसमें विद्यार्थियों की रचनात्मकता और चिंतन कौशल का उपयोग होना चाहिए। (जैसे— “यदि आप कहानी के मुख्य पात्र की जगह होते तो क्या करते? अपने शब्दों में लिखकर लाएं।”)
एक संक्षिप्त दृष्टांत (पाठ योजना का प्रारूप)
इस पूरी प्रक्रिया को एक छोटे से दृष्टांत के माध्यम से समझते हैं। मान लीजिए विषय ‘हिन्दी पद्य’ है और प्रकरण (कविता) है— माखनलाल चतुर्वेदी कृत ‘पुष्प की अभिलाषा’।
१. प्रस्तावना: शिक्षक प्रश्न पूछेगा— “हम भगवान की पूजा करने के लिए मंदिर में क्या-क्या अर्पित करते हैं?” (उत्तर: फल, मिठाई, फूल)। “फूलों को हम और क्या-क्या कहते हैं?” (उत्तर: पुष्प, सुमन, कुसुम)। अंतिम समस्यात्मक प्रश्न: “एक पुष्प की अपनी क्या इच्छा या अभिलाषा होती है, क्या आप जानते हैं?” (विद्यार्थी निरुत्तर)।
२. उद्देश्य कथन: “आज हम ‘पुष्प की अभिलाषा’ कविता पढ़ेंगे।”
३. प्रस्तुतीकरण: शिक्षक भावपूर्ण स्वर में कविता पढ़ेगा (“चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ…”)। फिर बच्चों से पढ़वाएगा। ‘सुरबाला’, ‘सम्राट’, ‘पथ’ जैसे कठिन शब्दों के अर्थ श्यामपट्ट पर लिखेगा और फिर पूरी कविता का अर्थ समझाएगा कि फूल केवल उस मार्ग पर बिछना चाहता है जहाँ से मातृभूमि की रक्षा के लिए वीर सैनिक गुजर रहे हों।
४. तुलना: शिक्षक इसकी तुलना देशप्रेम की किसी अन्य कविता या सैनिकों के बलिदान से जुड़े किसी प्रसंग से करेगा।
५. सामान्यीकरण: विद्यार्थी यह निष्कर्ष निकालेंगे कि देश और मातृभूमि की सेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं है। एक साधारण फूल भी देश के लिए बलिदान होना चाहता है।
६. पुनरावृत्ति एवं गृहकार्य: शिक्षक प्रश्न पूछेगा— “पुष्प ने वनमाली से क्या विनती की?” और अंत में गृहकार्य देगा— “देश के वीर सैनिकों के सम्मान में पाँच वाक्य लिखकर लाइए।”
निष्कर्ष हिन्दी भाषा का शिक्षण मात्र अक्षरों का ज्ञान देना नहीं है, बल्कि यह विद्यार्थियों के चरित्र, चिंतन और संवेदनाओं को परिष्कृत करने की एक साधना है। इस साधना में सफलता प्राप्त करने के लिए उचित नियोजन अपरिहार्य है। लक्ष्यों और उद्देश्यों का स्पष्ट ज्ञान शिक्षक को दृष्टि प्रदान करता है। इकाई योजना उसे विषय-वस्तु को समग्रता में देखने की क्षमता देती है, और हर्बर्ट की पंचपदीय प्रणाली पर आधारित दैनिक पाठ योजना उसे कक्षा-कक्ष में एक कुशल मार्गदर्शक बनाती है। जब ज्ञानात्मक, बोधात्मक और कौशलात्मक उद्देश्यों का ताना-बाना पाठ योजना के सुदृढ़ ढांचे में बुना जाता है, तब भाषा अधिगम की प्रक्रिया न केवल सरल और सुबोध हो जाती है, बल्कि विद्यार्थियों के लिए एक आनंददायक अनुभव बन जाती है।
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